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मीरास

उर्दू और हिन्दी शायरी का जीवंत संग्रह — मुफ़्त, खुला, तीन लिपियों में।

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मीरास के बारे मेंशब्दकोश
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© 2026 मीरास · एक खुला संग्रह

हमारे बारे में

भाषा, साहित्य और समाज का एक-दूसरे से गहरा संबंध होता है। भाषाएँ न तो एक दिन में अस्तित्व में आती हैं और न ही समाज की संरचना किसी एक क्षण में तैयार होती है। दोनों का निर्माण और विकास एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। पीढ़ी दर पीढ़ी भाषाएँ और सामाजिक मूल्य मीरास (विरासत) के रूप में मनुष्यों तक पहुँचते हैं। इसलिए उनका संरक्षण वर्तमान पीढ़ी की जिम्मेदारी है, ताकि वे आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुँच सकें। इसी उद्देश्य को सामने रखते हुए “मीरास” की स्थापना की गई है।

भाषाएँ केवल मन की बात व्यक्त करने का माध्यम नहीं होतीं, बल्कि वे उस समाज और भूभाग की सांस्कृतिक, सभ्यता और ऐतिहासिक विरासत की प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष साक्षी भी होती हैं, जहाँ उनका विकास होता है। हम सभी जानते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप, विशेषकर उत्तर भारत और दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों में, मध्यकाल से फ़ारसी और उसके बाद उर्दू भाषा का व्यापक प्रचलन रहा है। परिणामस्वरूप इन भाषाओं में हमारी सामाजिक, सांस्कृतिक और जीवन-यात्रा का विस्तृत लेखा-जोखा दर्ज होता रहा। जब गंगा-जमुनी तहज़ीब की चर्चा होती है, तो स्वाभाविक रूप से हमारा ध्यान क़ुली क़ुतुब शाह और नज़ीर अकबराबादी की रचनाओं की ओर चला जाता है।

उर्दू का अतीत अत्यंत गौरवशाली रहा है। इसे एक ओर राजदरबारों का संरक्षण मिला, तो दूसरी ओर जनता के प्रेम और समर्थन ने भी इसे समृद्ध बनाया। किंतु वर्तमान समय में उर्दू की स्थिति कुछ निराशाजनक दिखाई देती है। इसके पीछे संस्थागत उपेक्षा और आम लोगों की घटती रुचि, दोनों ही जिम्मेदार हैं। दुःख की बात यह है कि उर्दू के अध्यापकों और विद्यार्थियों ने भी इस भाषा की ओर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया। सामान्य पाठकों का जुड़ाव भी धीरे-धीरे कम होता गया। परिणामस्वरूप उर्दू से जुड़े अनेक संस्थान या तो बंद हो गए या केवल नाममात्र के लिए अस्तित्व में हैं। आज भी अनेक प्रतिष्ठित और महत्वपूर्ण साहित्यकार ऐसे हैं जिनकी संपूर्ण रचनाएँ न तो इंटरनेट पर उपलब्ध हैं और न ही उचित प्रकाशन माध्यमों से पाठकों तक पहुँच पाई हैं। यही परिस्थितियाँ “मीरास” की स्थापना का कारण बनीं।

“मीरास” ने अपने बुनियादी उद्देश्य के रूप में पाठकों को विभिन्न भाषाओं, विशेषकर उर्दू भाषा और उसकी समृद्ध एवं स्वर्णिम साहित्यिक परंपरा से जोड़ने का संकल्प लिया है। शास्त्रीय साहित्य, दास्तानों और मसनवियों से लेकर समकालीन उर्दू साहित्य की प्रमुख कृतियों तक पाठकों की सहज पहुँच सुनिश्चित करना “मीरास” की मूल प्राथमिकताओं में शामिल है।