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मीरास

उर्दू और हिन्दी शायरी का जीवंत संग्रह — मुफ़्त, खुला, तीन लिपियों में।

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© 2026 मीरास · एक खुला संग्रह

ग़ज़लें

ग़ज़ल

मेरी नवा शौक़ से शोर हरीम ज़ात में

अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल

समा सकता नहीं पहनाये फ़ितरत में मिरा सौदा

अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल

इश्क़ से पैदा नवा ज़िंदगी में ज़ेर व बम

अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल

की हक़ से फ़रिश्तों ने इक़बाल की ग़माज़ी

अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल

वाँ पहुँच कर जो ग़श आता पिये हम है हम को

मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल

जिस ज़ख़्म की हो सकती हो तदबीर रफ़ू की

मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल

कोह के हूँ बार ख़ातिर गर सदा हो जाइए

मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल

गर तुझ को है यक़ीन अजाबत दुआ न माँग

मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल

हुजूम नाला हैरत आजिज़ अर्ज़ यक अफ़ग़ां है

मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल

शुमार सुब्हा मरग़ोब बुत मुश्किल पसंद आया

मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल

ख़मोशीवं में तमाशा अदा निकलती है

मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल

गर न अंदोह शब फ़ुर्क़त बयाँ हो जाए गा

मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल

शब कि वो मज्लिस फ़रोज़ ख़ल्वत नामूस था

मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल

जब ब तक़रीब सफ़र यार ने महमिल बाँधा

मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल

कारगाह हस्ती में लाला दाग़ सामाँ है

मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल

जो हो सकता है उस से वो किसी से हो नहीं सकता

नवाब मिर्ज़ा ख़ान दाग़
ग़ज़ल

काबे की है हवस कभी कू-ए-बुताँ की है

नवाब मिर्ज़ा ख़ान दाग़
ग़ज़ल

कहते हैं जिस को हूर वो इंसाँ तुम्हीं तो हो

नवाब मिर्ज़ा ख़ान दाग़
ग़ज़ल

कौन सा ताइर-ए-गुम-गश्ता उसे याद आया

नवाब मिर्ज़ा ख़ान दाग़
ग़ज़ल

ख़ातिर से या लिहाज़ से मैं मान तो गया

नवाब मिर्ज़ा ख़ान दाग़