नक़्श फ़रियादी है किस की शोख़ी-ए-तहरीर का
काग़ज़ी है पैरहन हर पैकर-ए-तस्वीर का
काव-काव-ए-सख़्त-जानी हाए न पूछ
सुब्ह करना शाम का लाना है जू-ए-शीर का
जज़्बा-ए-बे-इख़्तियार-ए-शौक़ देखा चाहिये
सीना-ए-शमशीर से बाहर है दम शमशीर का
आगही दाम-ए-शुनीदन जिस क़दर चाहे बिछाए
मुद्दआ अनक़ा है अपने आलम-ए-तक़रीर का
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले
दिल-ए-नादान तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है
इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी थे काम के
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता
कोई उम्मीद बर नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती
हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़-ए-बयाँ और