Progressive · 1946–2018 · मेरठ – लाहौर
फ़हमीदा रियाज़ की "बदन दरीदा" (1973) ने एक ख़ामोशी तोड़ी — एक औरत बिना माफ़ी माँगे ख़्वाहिश, कोख और देह लिख रही थी। फ़ुहश-निगारी और फिर बग़ावत के मुक़दमे झेले, बरसों हिंदुस्तान में जिलावतनी काटी। रूमी और फ़रोग़ फ़र्रुख़ज़ाद के तर्जुमे किए। उनकी नज़्मों में सियासी ग़ुस्सा और चौंकाने वाली नर्मी साथ रहते हैं।
कोई शाइर नहीं मिला।