Modern · 1896–1982 · गोरखपुर – नई दिल्ली
रघुपति सहाय ने "फ़िराक़" — यानी जुदाई — तख़ल्लुस चुना। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में अंग्रेज़ी पढ़ाते हुए वे जदीद ग़ज़ल के सबसे बड़े शायरों में हुए। उन्होंने फ़ारसी रिवायत के साथ संस्कृत और हिंदी काव्यशास्त्र से भी रंग लिया। 1969 में उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला।
कोई शाइर नहीं मिला।