Progressive · 1919–2002 · मिजवां, आज़मगढ़ – मुंबई
कैफ़ी आज़मी आज़मगढ़ ज़िले के एक गाँव से कम्युनिस्ट तहरीक और मुशायरे के मंच तक पहुँचे और तरक़्क़ीपसंद तहरीक की सबसे इंसानी आवाज़ों में गिने गए। "औरत" जैसी नज़्मों ने औरतों को इंक़लाब में बराबर चलने की दावत दी। उन्होंने सिनेमा के लिए यादगार लिखा और बुढ़ापे में अपने गाँव मिजवां लौटकर स्कूल और सड़कें बनवाईं।
कोई शाइर नहीं मिला।