पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं
छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं
पृष्ठभूमि
शायर के बारे में
दिल्ली में जन्मे ग़ज़ल शायर, अपनी सरलता, प्रवाह और मुहावरेदार उर्दू के लिए विख्यात।
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असदؔ ज़िंदानी तासीर उल्फ़त हा ख़ूबाँ हूँ
ख़म दस्त नवाज़िश हो गया है तौक़ गर्दन में
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है