उस्तादों की एक महफ़िल — साथ बैठ कर पढ़ने के शेर।
पन्ना घुमाइए — एक-एक शेर सबके लिए।
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले
उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है
दिखाई दिए यूँ कि बेख़ुद किया
हमें आप से भी जुदा कर चले
तुम मेरे पास होते हो गोया
जब कोई दूसरा नहीं होता
असर उस को ज़रा नहीं होता
रंज राहत-फ़िज़ा नहीं होता
ख़ूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं
साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं
उज़्र आने में भी है और बुलाते भी नहीं
बाइस-ए-तर्क-ए-मुलाक़ात बताते भी नहीं