Classical · 1723–1810 · आगरा – लखनऊ
मीर तक़ी मीर अठारहवीं सदी के सबसे प्रमुख उर्दू शायर और ग़ज़ल के उस्ताद थे। मुग़ल दिल्ली के पतन के अशांत दौर में जीते हुए, उनकी शायरी ने कोमल विषाद को रोज़मर्रा की बोली से जोड़ा।
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है
दिखाई दिए यूँ कि बेख़ुद किया
हमें आप से भी जुदा कर चले
इब्तिदा-ए-इश्क़ है रोता है क्या
आगे आगे देखिए होता है क्या
मीर उन नीम-बाज़ आँखों में
सारी मस्ती शराब की सी है
नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है
बारे दुनिया में रहो ग़म-ज़दा या शाद रहो
ऐसा कुछ कर के चलो याँ कि बहुत याद रहो
इश्क़ इक मीर भारी पत्थर है
कब ये तुझ नातवाँ से उठता है
ले साँस भी आहिस्ता कि नाज़ुक है बहुत काम
आफ़ाक़ की इस कारगह-ए-शीशा-गरी का