पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है
लगने न दे बस हो तो उस के गिर्द-ए-रुख़्सार-ए-पुर-फ़न को
मैं बनूँ या बनूँ जो उस को गवारा जाने है
आगे उस मुत्तक़ी के हम जान क्या है और तकबीर क्या
रिंदी के हम अपने को हम गुम-रहगारा जाने है
चारा-गरी बीमारी-ए-दिल की रस्म-ए-शहर-ए-हुस्न नहीं
वर्ना दिलबर-ए-नादाँ भी इस दर्द का चारा जाने है
मीर के दीन-ओ-मज़हब को अब पूछते क्या हो उन ने तो
क़श्क़ा खींचा दैर में बैठा कब का तर्क इस्लाम किया
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है
दिखाई दिए यूँ कि बेख़ुद किया
हमें आप से भी जुदा कर चले
इब्तिदा-ए-इश्क़ है रोता है क्या
आगे आगे देखिए होता है क्या
मीर उन नीम-बाज़ आँखों में
सारी मस्ती शराब की सी है
नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है
बारे दुनिया में रहो ग़म-ज़दा या शाद रहो
ऐसा कुछ कर के चलो याँ कि बहुत याद रहो