फ़क़ीराना आए सदा कर चले
मियाँ खुश रहो हम दुआ कर चले
जो तुझ बिन न जीने को कहते थे हम
सो इस अहद को अब वफ़ा कर चले
कोई ना-उम्मीदाना करते
सो तुम हम से मुँह भी छिपा कर चले
बहुत आरज़ू थी गली की तेरी
सो याँ से लहू में नहा कर चले
कहें क्या जो पूछे कोई हम से मीर
जहाँ में तुम आए थे क्या कर चले
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है
दिखाई दिए यूँ कि बेख़ुद किया
हमें आप से भी जुदा कर चले
इब्तिदा-ए-इश्क़ है रोता है क्या
आगे आगे देखिए होता है क्या
मीर उन नीम-बाज़ आँखों में
सारी मस्ती शराब की सी है
नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है
बारे दुनिया में रहो ग़म-ज़दा या शाद रहो
ऐसा कुछ कर के चलो याँ कि बहुत याद रहो