कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़िर नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ मेंकि हज़ारों सज्दे तड़प रहे हैं मेरी जबीन-ए-नियाज़ मेंअल्लामा इक़बाल