Classical · 1877–1938 · सियालकोट – लाहौर
सर मुहम्मद इक़बाल, जिन्हें अल्लामा इक़बाल कहा जाता है, एक कवि, दार्शनिक और विचारक थे। उनकी उर्दू और फ़ारसी शायरी आधुनिक युग की सबसे प्रभावशाली रचनाओं में गिनी जाती है। "ख़ुदी" की उनकी अवधारणा ने साहित्य और राजनीतिक चिंतन दोनों को आकार दिया।
ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
सितारों से आगे जहाँ और भी हैं
अभी इश्क़ के इम्तिहान और भी हैं
तू शाहीन है परवाज़ है काम तेरा
तेरे सामने आसमान और भी हैं
खोल आँख ज़मीन देख फ़लक देख फ़ज़ा देख
मशरिक़ से उभरते हुए सूरज को ज़रा देख
नहीं तेरा नशेमन क़स्र-ए-सुल्तानी के गुम्बद पर
तू शाहीन है बसेरा कर पहाड़ों की चट्टानों में
मोहब्बत मुझे उन जवानों से है
सितारों पे जो डालते हैं कमंद
दिल से जो बात निकलती है असर रखती है
पर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती है
कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़िर नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में
कि हज़ारों सज्दे तड़प रहे हैं मेरी जबीन-ए-नियाज़ में
तेरे इश्क़ की इंतहा चाहता हूँ
मेरी सादगी देख क्या चाहता हूँ
जिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नहीं रोज़ी
उस खेत के हर ख़ोशा-ए-गंदुम को जला दो
उक़ाबी रूह जब बेदार होती है जवानों में
नज़र आती है इनको अपनी मंज़िल आसमानों में
यक़ीन मोहकम अमल पैहम मोहब्बत फ़ातेह-ए-आलम
जिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरें
गुज़र जा अक़्ल से आगे कि ये नूर
चराग़-ए-राह है मंज़िल नहीं है
न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिंदोस्ताँ वालो
तुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दास्तानों में