मैं एक मुसाफ़िर हूँ मेरी कोई नहीं
हर मेरी है और हर घर मेरा नहीं
पृष्ठभूमि
शायर के बारे में
खुली राह के एक काल्पनिक समकालीन शायर — रोज़मर्रा पर मूल मीरास कलाम।
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आ पड़ी दो सो बरस के मरदۂ बे जाँ में जान
जिस के ऊपर दो घड़ी हो मेहरबानी आप की
कुछ पास थे तो कुछ नहीं, कुछ आस थे तो कुछ नहीं
बंजारापन है ज़िंदगी, हर शय मुसाफ़िर की तरह