अब तो है मुद्दतों से शब व रोज़ रोबरो
कितने ही दिन गुज़र गए दीदार को तिरे
पृष्ठभूमि
शायर के बारे में
अमरोहा और कराची के बाग़ी शायर, अपनी मायूस शोख़ी और गुफ़्तगू-जैसी ग़ज़लों के लिए महबूब।
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