ये मालूम का मालूम तक है ऐ मनीरؔ
में कहाँ तक उन हदों के क़ैद ख़ानों में रहूँ
पृष्ठभूमि
शायर के बारे में
अजीब धुंधलकों और देर से आए पछतावों के शायर — "हमेशा देर कर देता हूँ मैं" — उर्दू और पंजाबी दोनों में।
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