हर एक बस्ती बदलती है रंग रूप कई
जहाँ भी सुब्ह गज़ारो अधर ही शाम करो
पृष्ठभूमि
शायर के बारे में
दोहों और ग़ज़लों के शायर, जिनकी ज़बान बोलती हुई हिंदुस्तानी है — नर्म, सेक्युलर और चुपके से बाग़ी।
Responses
No comments yet. Be the first to respond.