ज़ब्त
हक़ीक़त अज़ली है रक़ाबत अक़्वाम
तस्वीर व मुसव्विर
वाँ पहुँच कर जो ग़श आता पिये हम है हम को
जिस ज़ख़्म की हो सकती हो तदबीर रफ़ू की
ख़मोशीवं में तमाशा अदा निकलती है
अहद तफ़ली
शाइर
तरानह हनदी
अजब वाइज़ की दीनदारी है या रब
अनोखी वज़्अ है सारे ज़माने से निराले हैं
नवा ग़म
ग़ुलाम क़ादर रहीला
नानक
मता बे बहा है दर्द व सोज़ आरज़ू मंदी
!ईह पीरान कलीसा व हरम ऐ वाए मजबूरी
ख़ुदाई एहतिमाम ख़ुश्क व तर है
जिबरील वाबलीस
सवाल
चीवनटी अवरक़ाब