समा सकता नहीं पहनाये फ़ितरत में मिरा सौदा
तिफ़्ल शेर ख़्वार
अलतजाये मुसाफ़िर
की गोद में बली देख कर
व साल
इलाही अक़्ल ख़जसता पय को ज़रा सी दीवानगी सिखा दे
यूँ तो ऐ बज़्म जहां! दलकश थे हंगामे तिरे
वतनीत
ग़रा श्वाल
दुआ
जंग यर मोक काआईक वाक़िआ
ऐ बाद सबा! कमली वाले से जा कहियो पैग़ाम मिरा
फिर बाद बहार आई इक़बाल ग़ज़ल ख़्वाँ हो
ज़र यफ़ा न
ख़ुदी की शोख़ी व तनदी में किब्र व नाज़ नहीं
ये देर कुहन क्या है अम्बार ख़स व ख़ाशाक
ने महरा बाक़ी ने महरा बाज़ी
मोहब्बत का जुनूँ बाक़ी नहीं है
मोहब्बत