ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर से पहले
बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
अमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नुम भी
ये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी है
ख़ुदी का सिर्र-ए-निहाँ ला-इलाहा-इल्लल्लाह
ख़ुदी है तेग़ फ़साँ ला-इलाहा-इल्लल्लाह
ये माल-ओ-दौलत-ए-दुनिया ये रिश्ता-ओ-पैवंद
बुतों के वबनी हैं बचियो की कब्रा न बन
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा