ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर से पहले
बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
अमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नुम भी
ये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी है
ख़ुदी का सिर्र-ए-निहाँ ला-इलाहा-इल्लल्लाह
ख़ुदी है तेग़ फ़साँ ला-इलाहा-इल्लल्लाह
ये माल-ओ-दौलत-ए-दुनिया ये रिश्ता-ओ-पैवंद
बुतों के वबनी हैं बचियो की कब्रा न बन
ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
सितारों से आगे जहाँ और भी हैं
अभी इश्क़ के इम्तिहान और भी हैं
तू शाहीन है परवाज़ है काम तेरा
तेरे सामने आसमान और भी हैं
खोल आँख ज़मीन देख फ़लक देख फ़ज़ा देख
मशरिक़ से उभरते हुए सूरज को ज़रा देख
नहीं तेरा नशेमन क़स्र-ए-सुल्तानी के गुम्बद पर
तू शाहीन है बसेरा कर पहाड़ों की चट्टानों में
मोहब्बत मुझे उन जवानों से है
सितारों पे जो डालते हैं कमंद