लब पे आती है बन के तमन्ना मेरी
शमा की सूरत हो ख़ुदाया मेरी
दूर दुनिया का मेरे दम से अंधेरा हो जाए
हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए
हो मेरे दम से यूँ ही मेरे वतन की ज़ीनत
जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत
ज़िंदगी हो मेरी परवाने की सूरत या रब
इल्म की शमा से हो मुझ को मोहब्बत या रब
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा