हर के आख़िर में छुपी एक सहर होती है
थकी आँखों में भी कोई नई दोपहर होती है
पृष्ठभूमि
शायर के बारे में
शहरी भोर की एक काल्पनिक समकालीन शायरा — स्मृति और प्रवास पर मूल मीरास कलाम।
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मैं मशरिक़ की बेटी हूँ मगर मग़रिब में बसी हूँ
दो दुनियाओं के दरमियान एक पुल सी तनी हूँ
दो समकालीन स्त्रियाँ, दो शहर, एक तड़प।