हर रात के आख़िर में छुपी एक सहर होती है
थकी आँखों में भी कोई नई दोपहर होती है
मैं मशरिक़ की बेटी हूँ मगर मग़रिब में बसी हूँ
दो दुनियाओं के दरमियान एक पुल सी तनी हूँ
दो समकालीन स्त्रियाँ, दो शहर, एक तड़प।