Contemporary · हैदराबाद
ज़ोया मशरिक़ी मीरास संग्रह के लिए लिखी गई एक काल्पनिक समकालीन शायरा हैं; उनका कार्य मूल बीज-सामग्री है जो सार्वजनिक डोमेन में जारी की गई है, किसी वास्तविक लेखिका की नहीं। उन्हें निर्वासन और वापसी की शायरा के रूप में कल्पित किया गया है, जो सम्बद्धता, भाषा और दूर से देखे गए पूरब पर मुक्त-छंद नज़्में लिखती हैं। उनकी उपस्थिति समकालीन कोश को एक दूसरी, विशिष्ट आवाज़ देती है — पूरी तरह कॉपीराइट-मुक्त।
मैं मशरिक़ की बेटी हूँ मगर मग़रिब में बसी हूँ
दो दुनियाओं के दरमियान एक पुल सी तनी हूँ
वतन वो नहीं जहाँ पैदा हुए थे हम
वतन वो है जहाँ दिल को क़रार आता है
अपनी ज़बान को परदेस में यूँ सँभाले रखती हूँ
जैसे कोई माँ अपने बच्चे को सीने से लगाए
दूर से देखती हूँ तो मशरिक़ और भी रौशन लगता है
शायद दूरी ही मोहब्बत का असली रंग दिखाती है
रात के इस पार भी एक रात मेरी मुंतज़िर है
दो मुल्कों के दरमियान मेरा चाँद बँटा हुआ है
हर शाम यहाँ ढलती है तो वहाँ सुबह होती है
मैं दोनों के बीच कहीं गुम सी रह जाती हूँ
एक दिन लौट के जाऊँगी उस मिट्टी की ख़ुशबू तक
जहाँ मेरी जड़ें अब भी मेरे इंतज़ार में हैं
तुझे चाहा तो मालूम हुआ कि इश्क़ भी एक वतन है
जहाँ इंसान बे-ख़ौफ़ अपनी ज़बान बोल सकता है