Contemporary · लखनऊ
नूर जहाँ सहर मीरास संग्रह के लिए रची गई एक काल्पनिक समकालीन शायरा हैं — उनका कलाम मूल बीज-सामग्री है जो सार्वजनिक डोमेन को समर्पित है, किसी ऐतिहासिक व्यक्ति की रचना नहीं। उन्हें आधुनिक शहर की शायरा के रूप में कल्पित किया गया है: भीड़ भरी छतों पर भोर, स्मृति, प्रवास और स्त्रियों के शांत धैर्य की। उनका कलाम संग्रह को बिना किसी कॉपीराइट कविता के एक जीवंत, समकालीन आवाज़ दिखाने देता है।
हर रात के आख़िर में छुपी एक सहर होती है
थकी आँखों में भी कोई नई दोपहर होती है
मैं अपना शहर छोड़ आई पर शहर न छोड़ सका मुझे
हर ख़्वाब में वही गली वही घर वही दर होता है
वो औरत जो चुप रहती है उसे कमज़ोर न समझो
उसकी ख़ामोशी में छुपा एक समंदर होता है
छतों पे उतरती है जब पहली किरण सहर की
तो शहर की हर खिड़की में एक चराग़ सा जलता है
यादों के पुराने संदूक़ों में एक ख़ुशबू रहती है
जिसे खोलो तो बचपन का पूरा मौसम मिलता है
तेरे जाने के बाद भी तू मेरे साथ रहा
हर शाम चाय की प्याली में तेरा अक्स उतरा
दिल एक ऐसा मकान है जिसे बंद नहीं कर सकते
यहाँ हर आने जाने वाले का सामान रह जाता है
मेरी आँखों ने बहुत रातें जगी हैं तेरे लिए
अब नींद भी आए तो तेरा ही चेहरा ले आती है