लब पे आती है बन के तमन्ना मेरी
शमा की सूरत हो ख़ुदाया मेरी
दूर दुनिया का मेरे दम से अंधेरा हो जाए
हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए
हो मेरे दम से यूँ ही मेरे वतन की ज़ीनत
जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत
ज़िंदगी हो मेरी परवाने की सूरत या रब
इल्म की शमा से हो मुझ को मोहब्बत या रब
ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
सितारों से आगे जहाँ और भी हैं
अभी इश्क़ के इम्तिहान और भी हैं
तू शाहीन है परवाज़ है काम तेरा
तेरे सामने आसमान और भी हैं
खोल आँख ज़मीन देख फ़लक देख फ़ज़ा देख
मशरिक़ से उभरते हुए सूरज को ज़रा देख
नहीं तेरा नशेमन क़स्र-ए-सुल्तानी के गुम्बद पर
तू शाहीन है बसेरा कर पहाड़ों की चट्टानों में
मोहब्बत मुझे उन जवानों से है
सितारों पे जो डालते हैं कमंद