जिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नहीं रोज़ी
उस खेत के हर ख़ोशा-ए-गंदुम को जला दो
नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है